छाता रहा आफाक पे

छाता रहा आफ़ाक़ पे,
बादलों का –
सावनी हंसी समां।
कुछ बंधा -बंधा सा।
एक प्रेयसी –
लिये पथराए नयन –
गुम -सुम सरनिगू,
बेतहासा, बैठी है;
किसी के इंतज़ार पे –
जज़्बी एतमाद पे।
आँखों में बेकरारी ,बेबसी का इज़हार ,
पेशानी पे हार का इकरार।
अभी तक बैठी है –
हसरत की तुरबत पे,
चरागाँ ए-शाद जलाने को।
बीते लम्हात पाने को।
लेकिन ,क्या कभी –
पहचान पायेगा वो बेवफा प्रेमी –
उसके इंतज़ार को।
जज़्बी एतवार को।
सरापा -नियाज़ ,छुपी दामने -यकीं ,
बैठी है ,आज तक लेकिन –
किसको खबर थी ;
वो नहीं आएगा।
सावन का हंसी समां –
यूं ही गुज़र जायेगा।

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