चाहतों की लाश सडती मुफ्लिसी के सामने — गज़ल

चाहतों की लाश सड़ती मुफलिसी के सामने
ज़िंदगी सहमी रही उस बेबसी के सामने

ताब अश्कों की नदी की सह न पायेगा कभी
इक समन्दर कम पडेगा इस नदी के सामने

चांदनी कब चाहती थी दूर हो वो चाँद से
पर अमावस आ गयी उसकी खुशी के सामने

रहमतों की आस किस से कर रहा बन्दे यहां
आदमी कीड़ा मकोड़ा है धनी के सामने

उम्र लंबी हो ये चाहत भी नहीं रक्खी कभी
इक घड़ी अच्छी बहुत है इक सदी के सामने

ज़िंदगी की मस्तियों में भूल जाता बंदगी
किस तरह जाऊं खुदा के घर उसी के सामने

जीतना या हारना उड़ते परिंदे का भी क्या
हौसले टूटें जो आंधी की खुदी के सामने

ज़िंदगी का बोझ ढोना सीख लो मुझ से ज़रा
ढेर हो जाते कई मुश्किल घड़ी के सामने

चेहरे लीपे पुते उड़ती फिरें कुछ तितलियाँ
पानी भरता हुस्न लेकिन सादगी के सामने

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निर्मला कपिला
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लेखन विधायें- कहानी, कविता, गज़ल, नज़्म हाईकु दोहा, लघुकथा आदि | प्रकाशन- कहानी संग्रह [वीरबहुटी],... View full profile
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