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छंद कुण्डलिया छंद

Ankita Kulshreshtha

Ankita Kulshreshtha

कुण्डलिया

May 27, 2016

“”धरती अंबर सज रहे,
आया मास वसंत ।
योगी टेरे योग को,
नील गगन में हंस ।
नील गगन में हंस ।
स्वर्ग सा लगता ये थल..
भ्रमर हुए मदमस्त..
सरित भी करती कल कल
पुलकित सब संसार
चहुं दिशि खुशियां झरती
सुरभित है हर दिशा
सज रही सुंदर धरती।।।””

अंकिता

Author
Ankita Kulshreshtha
शिक्षा- परास्नातक ( जैव प्रौद्योगिकी ) बी टी सी, निवास स्थान- आगरा, उत्तरप्रदेश, लेखन विधा- कहानी लघुकथा गज़ल गीत गीतिका कविता मुक्तक छंद (दोहा, सोरठ, कुण्डलिया इत्यादि ) हाइकु सदोका वर्ण पिरामिड इत्यादि|
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