May 27, 2016 · कुण्डलिया
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छंद कुण्डलिया छंद

“”धरती अंबर सज रहे,
आया मास वसंत ।
योगी टेरे योग को,
नील गगन में हंस ।
नील गगन में हंस ।
स्वर्ग सा लगता ये थल..
भ्रमर हुए मदमस्त..
सरित भी करती कल कल
पुलकित सब संसार
चहुं दिशि खुशियां झरती
सुरभित है हर दिशा
सज रही सुंदर धरती।।।””

अंकिता

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Ankita Kulshreshtha
Ankita Kulshreshtha
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शिक्षा- परास्नातक ( जैव प्रौद्योगिकी ) बी टी सी, निवास स्थान- आगरा, उत्तरप्रदेश, लेखन विधा-... View full profile
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