कविता · Reading time: 1 minute

छंदमुक्त कविता

दिन उदाशी में रात आंखों में कटता था
दिन रात मन हमारा दिये सा जलता था

किस -किस के तानों से दिल चाक करते
कौन समझता किससे मन की बात करते

अन्दर ही अन्दर मन खोखला हो जाता है
बड़े बड़े दिलेरो का हौसला खो जाता है

टूटे हुए मन से जिम्मेदारी सम्भलता है कैसे
लिए कंधे पर बेटे की शव बाप चलता है जैसे

लगा लाईन खुदा की दरबार में जाकर
वो इक दिन सुनेगा ज़रूर पास बुलाकर

बादलों का सीना चीरकर सूरज निकलेगा
वक्त तो मौसम है ये ज़रूर बदलेगा

कामयाबी पर नहीं काम पर ध्यान दें
मजबूती से जीवन का हर इम्तिहान दें

माना‌ आदमी दुःख के रसातल में चला जाता है
लेकिन वहां से खुशियों का रत्न उठा लाता है

जीवन है अनमोल ये बुढ़ापे में। पता चलेगा
आदमी खुशी का इंतजार करने की खता करेगा।

नूरफातिमा खातून नूरी
कुशीनगर

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