Skip to content

चोटियों को मापती हैं बेटियाँ अब गगन

manan singh

manan singh

गज़ल/गीतिका

January 11, 2017

2122 2122 212

चोटियों को मापती हैं बेटियाँ
अब गगन बन बोलती हैं बेटियाँ।1

हो रहे रोशन अभी घर देख तो
रूढ़ियों को तोड़तीं है बेटियाँ।2

अब नहीं काँटे चुभेंगे पाँव में
रास्तों को मोड़ती हैं बेटियाँ।3

बाँटते- बँटते जहाँ सब लोग हैं
दो घरों को जोड़ती हैं बेटियाँ।4

फूल की ख्वाहिश पिरोये तू भले
शूल भरदम लोढ़ती हैं बेटियाँ।5

साफ दामन ही रहा तेरा सदा
कालिमा क्यूँ ओढ़ती हैं बेटियाँ?6

बन धरा जो आसमां को ढ़ो रहीं
सोच ले क्या सोचती हैं बेटियाँ।7
@

Share this:
Author
manan singh

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग से अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें और आपकी पुस्तक उपलब्ध होगी पूरे विश्व में Amazon, Flipkart जैसी सभी बड़ी वेबसाइट्स पर

साहित्यपीडिया की वेबसाइट पर आपकी पुस्तक का प्रमोशन और साथ ही 70% रॉयल्टी भी

साल का अंतिम बम्पर ऑफर- 31 दिसम्बर , 2017 से पहले अपनी पुस्तक का आर्डर बुक करें और पायें पूरे 8,000 रूपए का डिस्काउंट सिल्वर प्लान पर

जल्दी करें, यह ऑफर इस अवधि में प्राप्त हुए पहले 10 ऑर्डर्स के लिए ही है| आप अभी आर्डर बुक करके अपनी पांडुलिपि बाद में भी भेज सकते हैं|

हमारी आधुनिक तकनीक की मदद से आप अपने मोबाइल से ही आसानी से अपनी पांडुलिपि हमें भेज सकते हैं| कोई लैपटॉप या कंप्यूटर खोलने की ज़रूरत ही नहीं|

अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें- Click Here

या हमें इस नंबर पर कॉल या WhatsApp करें- 9618066119

Recommended for you