चूड़ियाँ......

चूड़ियाँ मुझको तब लुभाती हैं,
जब अनायास ही बज जाती हैं|
एक संगीत की सी स्वर लहरी,
बस मेरे मन में उतर जाती है|

मुझको वो खनखनाहट भाती है,
माँ के हाथों से जब भी आती है|
जब बनाकर वो प्यार से खाना,
अपने हाथों से खुद खिलाती है|
मुझको वो खनखनाहट भाती है..

मुझे वो खनखनाहट भाती है,
चाहे वो दूर से ही आती है|
राखियाँ बांधकर मेरी बहना,
आँख से नीर छलछलाती है|
मुझे वो खनखनाहट भाती है|

मुझे वो खनखनाहट भाती है,
हर समय मन को गुदगुदाती है|
जब भी आता हूँ मैं थका हारा,
बेटी सीने से लिपट जाती है|
मुझे वो खनखनाहट भाती है..

मुझे वो खनखनाहट भाती है,
मौन है फिर भी कुछ तो गाती है|
अलसुबह रोज़ जब प्रिया मेरी,
नहा के तुलसी को जल चढ़ाती है|
मुझे वो खनखनाहट भाती है,

-आर सी शर्मा “आरसी”
“दीपशिखा” विद्या विहार,
कोटा-342002

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