चूड़ियाँ

युग बदला, बदला नहीं, चूड़ी का श्रृंगार।
इस युग में भी चूड़ियाँ, मिलते कई प्रकार।। १

फैशन के युग में बने, नित नूतन आकार।
हर युग में हरदम रही, चूड़ी का व्यापार।। २

व्याह मांगलिक कार्य हो, पर्व-तीज-त्योहार।
रंग-बिरंगी चूड़ियाँ, अब भी पहने नार।। ३

नारी को भाती सदा, चूड़ी का उपहार।
हो चाहे शादीशुदा, चाहे रहे कुमार।। ४

लाल लाख की चूड़ियाँ, सुहाग की पहचान।
कहे कहानी प्रीत की, है पावन स्थान।। ५

सभी धर्म में चूड़ियाँ, पहनने का रिवाज ।
कर्ण प्रिय होता मघुर, चूड़ी की आवाज।। ६

आदि काल से चूड़ियाँ, संस्कृति का आघार।
खुशहाली की चिन्ह यह, प्रमुख कर अलंकार।। ७

खनके हाथों में सदा, चूड़ी वृत्ताकार।
रिक्त कलाई हो नहीं, भरी रहे दो-चार।। ८

पहने बेटी हाथ में, चूड़ी बनी दुलार।
बहू कलाई पर सजी, घर का पूरा भार।। ९

बड़ी निगोड़ी चूड़ियाँ, , आये कभी न बाज।
खनक-खनक कर हाथ में,कह दे सारे राज।। १ ०

रिश्ते चूड़ी की तरह, गये हाथ से छूट।
रहते कुछ दिन साथ में, फिर जाते हैं टूट।। १ १

जो अपने बनकर रहे, गये भँवर में छोड़।
जैसे चूड़ी काँच की, दिये खेल में तोड़।। १ २

चूड़ी वाले हाथ को, मत समझो बेकार।
भारत, लंका पाक में, सफल रही सरकार।। १ ३

“बैठ पहन कर चूड़ियाँ “, उपमा दी कमजोर।
धरा-गगन से चाँद तक, है चूड़ी का शोर।। १ ४
-लक्ष्मी सिंह

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