" चुलबुली "

अनजानी सी एक लड़की थी ,
जब वो मिली तो कक्षा में मेरी सहपाठी थी ,
हर पल खुशियां बांटती थी ।

हमेशा मुस्कुराती थी ,
हमेशा चमकी सुरत थी ,
नादानी की मुरत थी ।

ड्रामा की महारानी थी ।
मेरे लिए मेरा पांडा थी ,
मैं उसे चुलबुली कह कर बुलाती थी ।।

हमारे बीच भी गहरे प्रेम की दोस्ती थी ,
मेरे हर गुस्से का कारण जानती थी ,
गलती हो किसी की भी वो हमेशा मनाती थी ।

हमेशा मेरी चिंतन में लगी रहती थी ,
हर पल मुझसे दूर होने से डरती थी ,
क्योंकि खुद से ज्यादा वो मुझसे प्रेम करती थी ।

ना जाने किसकी गलती थी ,
जिसने गलतफहमी पैदा कर दी थी ,
वो मुझसे दूर हो गई थी ।

मैं पल पल उसकी यादों में तड़पती थी ,
बहुत कुछ बातें उससे मुझे करनी थी ,
जाने अंजाने मैंने ही उसका हृदय को चोट पहुंचाई थी ,
तभी तो वो मुझसे दूर हो कर रह रही थी ।

खुबसूरत सुनहरे बाल उसके थे ,
आंखों में काजल भी लगाती थी ,
कोई और नहीं वो मेरी चांदनी थी ।

🤗🤗🤗🤗🤗🤗🤗🤗🤗🤗🤗🤗

( 12 दिसंबर – ये कविता मेरी प्रियसहेली चांदनी के जन्मदिन के अवसर पर उसको उपहार स्वरूप समर्पित है । )

🙏 धन्यवाद 🙏

✍️ ज्योति ✍️
नई दिल्ली

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