चुनावी दौर और नेता जी

लोकतंत्र का पर्व है, आया मुहूर्त है ये चंगा।
अब नेताओं की भीड़ लगेगी,वादों की बहेगी गंगा।।

सूट बूट सब छोड़ दिए हैं, कुर्ते पुराने लाए।
पड़े हुए थे वर्षो से जो, वो जूते भी सिलवाए।।

वोट मांगने निकले नेता, पर्चे है छपवाए।
पैरों में गिर गए किसी के, किसी के बर्तन भी धुलवाए।।

अनपढ़ ठहरे भैया हम, तो जाने ना व्यापार।
पर बच्चों का भविष्य तुम्हारे, देंगे हम सँवार।।

जात पात का भेद छोड़कर, साथ में भोजन खाते।
फिर जातिवाद का छेड़ के मुद्दा, हम आपस में लडवाते।।

बड़े-बड़े घोटाले किये है, हम फिर भी सब को भाये।
जो मांगे हिसाब हम से, हम स्वर्ग उसे पहुचाये।।

चिल्ला चिल्ला कर कहते हैं, कि हम है महिला रक्षक।
सत्ता पाकर बन जाते हैं, हम ही उनके भक्षक।।

बात से माने जो तुम न, दारू पैसा भी बनवायेंगे।
वोट दिया न तुमने जो, तो हम तुम को धमकाएगे।।

इनकी बातो में न आना, करना सही मतदान।
एक वोट से भैया तुम्हारे, होगा देश महान।।

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