चीख - जिसे सुनकर किया अनसुना

चीख – जिसे सुनकर किया अनसुना

मासूम एक आठ साल की छोटी सी बच्ची जिसे अभी लोगों को पहचानना तक नहीं आया था। जिससे मिलती उसी से कुछ यूँ घुल-मिल जाती मानो बचपन से जानती हो। इसकी वो आँखें उसके गाल उसका वो मुस्कुराता हुआ चेहरा ऐसा लगता था जैसे ईश्वर ने हर चीज, हर एक बात अपने खजाने से छाँट कर दी हो। बड़ी प्यारी बच्ची थी और होती भी क्यों ना मासूम जो थी। उसके खूबसूरत चेहरे पर उसकी वह खिलती हुई मुस्कान सच में निशा की तो जान थी वो, और निशा जान से ज्यादा प्यार करती थी उससे और अनिल, अनिल के लिए तो एक जादू की पुड़िया थी, एक ऐसी जादू की पुड़िया जिसे देखकर वो हर गम,तकलीफ, थकान सब कुछ भूल जाता था, सब कुछ।

अनिल आज से कुछ समय पहले इसी शहर की चौल में छोटे से कमरों में अपना जीवन जिया करता था। लेकिन आज अनिल ने उस बड़े से शहर में कड़ी मेहनत और लंबे परिश्रम के बाद वह इमेज बना ली थी कि बड़े से बड़े घराने के लोग भी उससे अदब से पेश आते थे। अनिल को अपनी शाख बहुत प्यारी थी और होती भी क्यों ना ये उसके 15 सालों की मेहनत और त्याग ही है जो आज उसे यहां तक ले आया है।

शनिवार का दिन था अनिल ऑफिस से जल्दी घर आ गया था और निशा भी घर में बैठी बोर हो रही थी।
निशा – अनिल क्या हम कहीं घूमने चले ?
अनिल – हाँ, सोच तो मैं भी यही रहा था। मगर मासूम, मासूम सो रही है ना।
निशा – हाँ, मासूम सो रही है
अनिल – तो फिर ?
निशा – अच्छा आज रहने दो कल चलेंगे मासूम के साथ।
अनिल – हाँ यही सही रहेगा।
निशा – वैसे भी मासूम के बिना वो बात कहाँ।
अनिल – सही कह रही हो। वैसे तुम चाहो तो हम पास में कॉफ़ी पी सकते हैं ।
निशा – लेकिन मासूम?
अनिल – अरे 5 मिनट की ही तो बात है।
निशा – हाँ पर मासूम को घर पर अकेला छोड़ना…..
अनिल – अच्छा रुको मैं निधि को फोन करता हूँ वो कुछ देर के लिए घर आ जाएगी। आखिर वह भी तो चाची है।
अनिल ने निधि को फोन लगाया
अनिल – हैलो निधि क्या तुम कुछ देर के लिए घर आ जाओगी?
निधि – क्या हुआ भईया यूँ अचानक घर पर क्यूं ?
अनिल – अरे कुछ नहीं वो क्या है ना मैं और निशा कुछ देर के लिए बाहर जा रहे थे और मासूम घर में अकेली थी बस 10 -15 मिनट की ही बात है।
निधि – नहीं भईया मैं तो घर पर नहीं हूँ, पर रुकिये मैं अजय से बोल देती हूँ वो आ जाएगा। चाची नहीं तो क्या हुआ चाचू तो है ना।
अनिल – हाँ ठीक है पर थोडा जल्दी हाँ।
निधि – हाँ भईया बस 2 मिनट।
अनिल – अरे सुनो निधि तो घर पर नहीं है।
निशा – तो फिर?
अजय – लेकिन अजय आ रहा है
निशा – अजय भईया हाँ तो ठीक है ना आ जाने दो। वैसे भी जितना प्यार मासूम से हम करते हैं उतना ही अजय भैया भी तो करते हैं।
वह होंगे तो मासूम बहुत खुश और सुरक्षित होगी हमारे चिंता करने के लिए कोई बात ही नहीं।
अनिल – हाँ ये तो बात तो है बहुत प्यार करता है वो भी मासूम से।
निशा :- सच कितने लकी हैं ना हम सब हमारी बच्ची को कितना प्यार करते है।
अनिल :- अरे हमारी मासूम है ही इतनी प्यारी, सब की प्यारी। अब चलें….?
निशा :- हाँ चलो जल्दी जाकर जल्दी आना है।

निधि ने अजय को फोन कर दिया और फिर कुछ ही देर में अजय अनिल के घर पहुंच गया। और फिर अनिल और निशा दोनों वहाँ से निकल गए। अजय घर पर अकेला था। और साथ थी वो छोटी सी बच्ची मासूम। मासूम सो रही थी अजय इधर-उधर टहलने लगा कुछ देर बाद उसने कमरे की ओर देखा, कमरे में मासूम से हो रही थी। मासूम को वहा सोता देख अजय उसके पास जाकर बैठ गया अजय ने धीरे-धीरे मासूम की ओर आपने हाथ बढ़ाने शुरु कर दिये वो कभी मासूम के सिर पर हाथ फेरता तो कभी मासूम के गालो को छूने लगा। एक पल तो यूँ लगा जैसे वो मासूम को अपनी बच्ची की ही तरह प्रेम कर रहा हो लेकिन, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं था। कुछ देर बाद….. अजय के हाथ उसके सिर और गालों से हटकर उसके पूरे बदन की ओर जाने लगे। उसके वो उसके जिस्म के हर एक भाग को छूने लगा उसके गाल को छूना उसके बालों के साथ खेलना और इसे माथे पर चूमने लगा और तभी मासूम उठ गई।

मासूम :- चाचू आप यहां पर ?
अजय :- कुछ नहीं बेटा तुम सो जाओ मम्मी पापा कुछ काम से बाहर गए हैं जब आएंगे तो मैं तुम्हें जगा दूंगा।
मासूम :- पर चाचू हमें तो नींद नहीं आ रही
अजय :- अच्छा तो फिर चलो हम आपके साथ एक गेम खेलते हैं।
अजय उससे बात करने लगा और बात करते करते ही उसने मासूम के अंगों को भी छूना शुरू कर दिया जिन अंगों की कीमत मासूम भी नहीं जानती थी। मासूम के कपड़ों के साथ खिलवाड़ करता अजय अब भी नहीं रुका। मासूम नहीं जानती थी कि वह क्या कर रहा है और क्यों । वह सहम गई और अजय धीरे-धीरे अजय अपनी हदें पार करता गया और फिर एक समय ऐसा भी आया जब अजय किसी हैवान सा उस छोटी सी बच्ची पर हावी हो गया उसके वह कठोर हाथ जो बार-बार मासूम के कोमल शरीर के अंगों को छूने लगे। कुछ देर बाद मासूम चिल्ला उठी चाचू हमें छोड दीजिए, हमें जाना है। मगर अजय ने उसकी की एक ना सुनी अजय ने उसका मुह दबा दिया। चुप रहो मासूम क्या कर रही हो? मासूम ने अजय का हाथ झटक दिया और वहा से भागने लगी मगर वो अजय की पकड से दूर नहीं जा पाई थी अजय ने उसे हाथ बढ़ा कर दबोच लिया। वो चीखी….. बार-बार चीखी मगर उसकी वो चीख, कोई सुन नहीं पाया। अजय ने उस दिन खेल के नाम पर उस छोटी सी बच्ची की इज्जत के साथ हैवानियत की सारी हदें पार कर दी। उसकी चीख उस घर की दीवारों से टकराकर बार-बार वापस आती रही वह मासूम सी, छोटी सी बच्ची रोती रही चीखती रही और अजय, अजय ने अपनी हवस की आग में उस छोटी सी बच्ची तक को नहीं छोड़ा। मासूम तो अभी सही तरह जानती भी नहीं थी कि उसके साथ क्या हुआ लेकिन अजय, अजय को सब पता था की वो क्या कर रहा है और उसकी इस हरकत से एक बार फिर से मानवता तार-तार हो गई। और वो रिश्ते जो किसी विश्वास के साथ जोड़े जाते है आज फिर से कटघरे में थे। और उनसे प्रश्न करने की हकदार मासूम…….. वो तो खुद ही एक ऐसा प्रश्न बन गई थी जिसका जवाब किसी के पास नहीं था।

अजय कुछ देर वहा रुका उसके बाद मासूम को फुसला कर चुप करा कर अजय कुछ देर के बाद वहां से चला गया और मासूम रोते-रोते सो गई।
शाम के समय जब निशा वापस आई तब उसने आवाज़ लगा मासूम को बाहर बुलाया। वो बाहर नहीं आई, और ना ही उसने निशा की बात का जवाब दिया। कुछ देर बाद निशा ने कमरे के भीतर जाकर देखा तो मासूम अपनी पलंग पर बैठी रो रही थी। निशा ने उससे पूछा क्या हुआ? क्या हुआ? कई बार… कई तरीकों से, निशा पूछती रही मगर मासूम का मौन नहीं टूटा।
अनिल शाम को घर आते से ही सा आवाज लगाता है मासूम, मासूम कहां हो बेटी?
निशा – अच्छा हुआ अनिल तुम आ गए देखो ना मासूम कब से रोए जा रही है चुप ही नहीं हो रही मैंने इतने जतन किए अब मैं तो हार गई। तुम ही कुछ करो ले कर सकते हो तो?
अनिल – अरे-अरे क्या हुआ हमारी बिटिया रानी को बताओ?
मासूम मौन थी। अब भी…..
निशा – देखा अभी भी किस तरह चुप है जब से सोकर उठी है तब से कुछ बोलती ही नहीं।
अनिल – अरे निशा तुम परेशान मत हो। कोई बुरा सपना देखा है इसीलिए थोड़ा डर गई है, सब ठीक है।
कुछ देर बाद तीनों खाने की मेज पर बैठ जाते हैं मासूम खाना नहीं खा रही है। तभी बातों ही बातों में कहीं से अजय की बात निकल आई और अजय का नाम सुनते ही वह बोल रो पड़ी और बोली चाचू गंदे, चाचू गंदे।
निशा – अनिल मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा
अनिल – मतलब?
निशा – मासूम का यूँ अजय के नाम से डरना…… भला क्यूं? क्यूँ डर रही है वो?
निशा और भी ज्यादा परेशान हो गई उसने अजय को फोन लगा दिया और पूछ लिया — क्या हुआ मासूम तुम्हारे नाम से इतनी डरी हुई क्यों है?
कुछ नहीं भाभी वह आज मैंने उसके साथ एक डरावना खेल खेला था बस और कुछ नहीं इसीलिए डर गई होगी?
अच्छा तो ये बात है मैं भी तो देखूं कौन सा खेल खेला था?
आप कहां देखोगी?
अरे यही घर के सीसीटीवी फुटेज में और कहां।
अजय नहीं जानता था कि उस घर में सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं।
अजय का पाप पकडाने वाला था और अब तक वो भाग चुका था।
निशा और अनिल ने सीसीटीवी कैमरे की रिकॉर्डिंग देखना शुरू किया। घर के कैमरे में सब कुछ कैद था। वह डर है जिसे अनिल और निशा बुरा सपना समझ रहे थे वह कोई सपना नहीं बल्कि एक ऐसी कड़वी हकीकत थी जिसमें तस्वीरें चीख रही थी जिसकी वजह से मासूम मौन थी, अनिल और निशा शून्य हो चुके थे और मानवता किसी कोने में सर झुका है गौण खड़ी थी।
निशा अभी कहीं गुम थी
अनिल – अजय….. मैं तुम्हें नहीं छोडूंगा।
अनिल बढ़ा ही था कि निशा ने उसका हाथ थाम कर रोक लिया।
निशा – कहां जा रहे हो?
मैं इस अजय को नहीं छोडूंगा।
निशा – क्या करोगे?
अनिल – मार डालूंगा उसे, पुलिस केस करूंगा उस पर, मैं उसे जेल भिजवा कर रहूँगा।
निशा – अच्छा इस सब से क्या होगा ? यही ना कि दुनिया तुम्हारी पीठ थप-थपाएगी। यही ना कि कितना अच्छा आदमी है जिसने अपनी बेटी के लिए इतना कुछ किया था।
निशा – अरे दुनिया थूकेगी हम पर, और मासूम वो तो बेचारी अभी ये तक नहीं जानती कि उसके साथ हुआ क्या है। उसका क्या होगा ? क्या उसकी जिंदगी शुरू होने के पहले ही खत्म कर देना चाहते हो?
अनिल – मगर निशा…..

निशा – क्या अनिल ? देखो यह समय आवेश में आकर फैसले लेने का नहीं है। जो होना था हो गया है। मैं कहती हूं कुछ देर रुको, ओर सोचो उसके बाद तुम्हें जो ठीक लगे करो। लेकिन याद रखना अनिल अगर यह बात घर के बाहर गई तो हम कहीं के नहीं रह जाएंगे और हमारे से ज्यादा हमारी छोटी सी बेटी मासूम उसकी जिन्दगी, उसकी जिन्दगी तो शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाएगी।

निशा – अनिल इस घर की चार दिवारों के बाहर कोई नहीं जनता की मासूम के साथ क्या हुआ। और अगर हमने बात बढ़ाई तो इस से हमें सिर्फ और सिर्फ हमारी बदनामी के सिवा और कुछ हासिल नहीं होगा।
अनिल हमारी बच्ची की ओर देखो उसके आने वाले कल के बारे में सोचो….. प्लीस अनिल प्लीस…… रुक जाओ।

निशा ने अनिल को कसमों, वादों और अपनी बातों के बंधन में बांध लिया। अनिल के भीतर बदले की आग जल रही थी लेकिन अपनी इज्जत और मासूम के आने वाले कल की परवाह ने उसे मौन रहने पर मजबूर कर दिया। अनिल ने कोई पुलिस केस नहीं करवाया और ना ही इस सब के बारे में किसी ओर को पता चलने दिया। अनिल ने फैसला किया कि वह यह शहर छोड़ देगा और अजय से सारे रिश्ते नाते तोड़ कर एक ऐसे शहर में जाकर रहेगा जहाँ उसकी मासूम किसी अजय को कभी नहीं मिलेगी। कुछ दिनों बाद अनिल ने वह शहर छोड़ दिया और वो एक नए शहर में जाकर रहने लगा। अजय और निशा भले ही अपने इस कदम को अपने और अपनी बेटी मासूम के लिए सही मानते हो लेकिन, उस दिन की कड़वी हकीकत तो यही है, कि उस दिन भी रिश्तों के बंधन और समाज की झूठी इज्जत के चक्कर में खुद मासूम के मां – बाप ने उन चीखों को सुनकर भी अनसुना कर दिया जो उनकी बेटी मासूम की यादों में एक घाव की तरह हमेशा जिंदा रहेंगी। क्यूँकी वो आज बच्ची है, आज नादान है, मगर एक दिन ऐसा भी आयेगा जब उसकी ये नादानी समझदारी में बदल जायेगी और तब, जब ये घाव उसे दर्द देगा तब इस दर्द की दवा न ही अनिल के पास होगी और न ही निशा के पास। क्यूँकी आज जिस चीख को अनिल ओर निशा का साथ मिलना चाहिए था जिसकी आवाज इतनी तेज होनी चाहिए थी की उसकी गूँज से अजय को उसके किए की सजा मिलनी चाहिए थी वो चीख आज सुनकर भी अनसुनी कर दी गई।

समाप्त

कहानीकार
भवानी प्रताप सिंह ठाकुर
भोपाल मध्य प्रदेश
संपर्क – 8989100111
thakurbhawani66@gmail.com

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