.
Skip to content

चीख-चीख कह रही धरा

लक्ष्मी सिंह

लक्ष्मी सिंह

कविता

June 5, 2017

????
चीख-चीख कह रही धरा,
मुझको रखो हरा – भरा।

विनाश का बादल मंडरा रहा,
वृक्ष लगाओ ज्यादा से ज्यादा।

सारा वायुमंडल हो रहा है गर्म,
अब तो मानव करो कुछ शर्म।

कुछ तो समझो मानव जरा,
खत्म हो जायेगा अस्तित्व मेरा।

सोच कर बता फिर रहोगे कहाँ,
जब वातावरण ही ना रहेगा यहाँ।

ओजोन परत में हो गया है छेद,
बस कर अब प्रकृति से ना खेल।

प्रकृति को मत कर छिन्न-भिन्न,
मानव अस्तित्व पर लगेगा प्रश्न चिन्ह।

पेड़ों को ऐसे अंधाधुंध कटेगा।
फिर धरा पे तापमान बढ़ जायेगा।

तब तो मैं भी हो जाऊँगी नष्ट,
जन-जीवन हो जायेगा ध्वस्त।

इन्सान होगा कई रोगों से ग्रस्त,
तबाही विनाश से होगें सब त्रस्त।

समय रहते सम्हालो ऐ मानव,
मत बनो खुद अपना ही दानव।

जागरूकता फैलाओ जनजन में,
पेड़ लगाओ हर एक आँगन में।
????—लक्ष्मी सिंह ?☺

Author
लक्ष्मी सिंह
MA B Ed (sanskrit) My published book is 'ehsason ka samundar' from 24by7 and is a available on major sites like Flipkart, Amazon,24by7 publishing site. Please visit my blog lakshmisingh.blogspot.com( Darpan) This is my collection of poems and stories. Thank... Read more
Recommended Posts
प्रकृति और मानव
नित शीतल चाँदनी धरा पर अब सर्वत्र चमक रही है। फिर भी राहो में क्यों मानो अग्नि दहक रही है। बागों में फूल कलियां वे... Read more
ईश्वर की महिमा
जलमग्न धरा कई ओर हुई मानव पे संकट आय रही, इस बिपदा से कैसे हों विलग यह बात सबन को खाय रही। . तपती धरती... Read more
मानव ने खूब की मनमानी
मानव ने खूब की मनमानी प्रकृति की कर दी हानि गंदी कर दी हवा पानी खनन किया की मनमानी धरती अब नही रही धानी वृक्ष... Read more
खामोशी की चीख
खामोशी की चीख में,सुन्न हुआ अब शोर लगा रहे सब आंकलन,किसका होगा जोर किसका होगा जोर,रहे भरमायी जनता जनसेवक जो आज,वही कुर्सी पर तनता कुर्सी... Read more