चिड़ियाघर में सर्दी

लाल गुलाबी सर्दी आई, जर्सी स्वेटर टोपी लाई
दस्ताने हाथों में पहने ठिठुर रहे हैं बन्दर भाई.

बालों को ओढ़े बैठे हैं भोले – भाले भालू दादा
भून भून कर मज़े से खाते सोंधे सोंधे आलू दादा

बिल्ली मौसी ने खोला है नुक्कड़ पर एक होटल
साउथ इंडियन, चाइनीज़, पंजाबी के संग लोकल

चाय, समोसा और पकौड़ी के संग मुफ्त है चटनी
लम्बा आर्डर मिला अगर तो होम डिलीवरी करनी

डाल डाल पर फुदक रही है आज गिलहरी रानी
धूप छिपा लेता है बादल क्यों करता मनमानी

बूढ़े गीदड़ परेशान हैं सर्दी, दमा, जुकाम से
छींक-छींक कर जगा दिया जो सोये थे आराम से

बगुला भाई एक टांग पर सूरज से बातें करते हैं
तोता राम राम की जगह धूप धूप की रट रटते हैं

चतुर लोमड़ी बात पूछ बैठी ये दरियाई घोड़े से
पानी में हर दम रहते हो डरते नहीं हो जाड़े से

सारी सर्दी कायनात की, चिड़ियाघर में बैठी है
सर्द हवाओं की गिरफ्त में पूरी धरती ऐंठी है .

-प्रदीप तिवारी ‘धवल’

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मैं, प्रदीप तिवारी, कविता, ग़ज़ल, कहानी, गीत लिखता हूँ. मेरी तीन पुस्तकें "चल हंसा वाही...
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