चित चंचल मोरा वश में नाही..

चित चंचल मोरा वश में नाही..
जबसे छवि देखी प्रीत की ..
प्रेम की बदरी बरसत रिमझिम
उर जानत है मन रीत की ..!१

अंखियन में कजरा बहकत ऐसे
जैसे ऋतु शरद की शीत सी ,
मधु प्यासा मधुकर भटकत ऐसे
जैसे रद भ्रमण हो विपरीत की..!२

बदलत करवट पल पल लेटे
क्यो जागे सारी-सारी रतियाँ,
मन मोरा ठहरा बड़ा हरामी..
न मानय कबहुँ मोरी बतियाँ..!३

सुन पवन गीत को मीत मोरे
नाही समझत प्रेम-विनीत को,
कैसे समझाये कहीं बिसरा न दे
मन कचोटत है इस भयभीत से..!४

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