चिठ्ठी

जाने कहां खो गई
वो नीली सी
प्यारी सी चिट्ठी….
आज भी आता
थैला उठाए डाकिया
लेकिन…
कभी फोन तो
कभी थमाता
बिजली का बिल…
अब न होती
पहले सी बेकरारी
और इंतज़ार…
वो आत्मीयता
और अपनापन
वो स्पर्श का
सुखद एहसास…
गुम से गए हैं
आवाजों के जंगल में….

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