चिंता

आज अबोद्ध ङूँ असमंजस में
अचेत सा राह उम्मीद की देख रहा ।
सोच नहीं संकल्प नहीं,
व्यथाओं का विकल्प नहीं
विङंबनाओं का डेरा है
सामने अन्नत अंधेरा है ।
आघात हो तो संभल सकूं
बाट हो तो शूल पे भी चल सकूं ।
ये चक्रव्युह सा मरु मगर
वृताकृति सा परिमाप
केंद्र से सटी परिधि इसकी
दिखता अंत वहीं त्रिज्या का जिधर चलूं ।
कालचक्र चला तीव्र हुआ
दिख रहा ना छौर कोई भोर का ,
मैं स्थिर, मति स्थिर जङ खङा कूप गहरे
अंधकारी सा हुआ ढूँढ रहा मरिचिका ।
गंध है ना लोल कोई हाथ में ना डोर कोई
पाँव ज्यो अधरंग हुए, बेजुबां सा ,
पूछ रहा अदृश्य अज्ञात से मैं
इस काल कुम्भ का पता ।
ना सितारों की चमक, ना अंशु की झलक ,
दिशा बदलती है यहाँ हर गिरती पलक ।
अधीर हुआ इधर उधर मारु कर
दूबनाल, सन काँप या सूखी लता
जो मिले ले इशारा तनिक सा ,
जगा सकूँ हृदय अलख
पहुँच सकूँ धरा तलक ।

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