गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

चाहत

बसंत के मौसम में ।
झड़ते पतझड़ से ।

झरने वो निर्मल से ।
झरते जो निर्झर से ।

भाव जगे उर से ।
शून्य रहे नभ से ।

बहने की चाहत में ,
“निश्चल” सागर से ।

…. विवेक दुबे”निश्चल@….

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