.
Skip to content

* चार शेर *

भूरचन्द जयपाल

भूरचन्द जयपाल

शेर

February 27, 2017

जीना चाहा था मगर
जिंदगी ना मिली ।
मौत भी अब हमसे
अपना दामन छुड़ा के चली ।।

लोग कहते हैं अब भी
मै जिन्दा हूँ मगर
जिंदगी को अलविदा कहे
जमाना गुजर गया ।।

मै कहता रहा जिंदगी से
मुझे रवानी दे दे ।
वरना मुझे मेरी
खोई हुई जवानी दे दे ।।

मेरी मजबूरियों को मेरी
कमजोरियां मत समझज़ालिम
कुछ तो समझ ये तो
मुझे जीने का होंसला देती है ।।

?मधुप बैरागी

Author
भूरचन्द जयपाल
मैं भूरचन्द जयपाल सेवानिवृत - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना आदि में... Read more
Recommended Posts
ये माना घिरी हर तरफ तीरगी है
ये माना घिरी हर तरफ तीरगी है मगर छन भी आती कहीं रोशनी है न करती लबों से वो शिकवा शिकायत मगर बात नज़रों से... Read more
क्यू नही!
रो कर मुश्कुराते क्यू नही रूठ कर मनाते क्यू नही अपनों को रिझाते क्यू नही प्यार से सँवरते क्यू नही देख कर शर्माते क्यू नही... Read more
आहिस्ता आहिस्ता!
वो कड़कती धूप, वो घना कोहरा, वो घनघोर बारिश, और आयी बसंत बहार जिंदगी के सारे ऋतू तेरे अहसासात को समेटे तुझे पहलुओं में लपेटे... Read more
निकलता है
सुन, हृदय हुआ जाता है मृत्यु शैय्या, नित स्वप्न का दम निकलता है। रोज़ ही मरते जाते हैं मेरे एहसास, अश्क बनकर के ग़म निकलता... Read more