चांद

चांद चुपके से एक रात तेरे छजजे पे उतर आया होगा
तेरी शोख हंसी ने ही उसे मुस्कान का मतलब सिखाया होगा
~ पुर्दिल सिद्धार्थ
रात निगलता रहा सूरज को कभी आग न हो सका
चांद सदियों में भी रात के दिए दाग न धो सका
~ सिद्धार्थ
रात अपने आंगन में टूटता तारा सुबक के रोया था
चांद जब और किसी के पहलू में जाके सोया था
~ सिद्धार्थ

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मुझे लिखना और पढ़ना बेहद पसंद है ; तो क्यूँ न कुछ अलग किया जाय......
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