गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

चाँद सह्न पर आया होगा

होगी आग के दर्या होगा
देखो आगे क्या क्या होगा

ख़ून रगों में लगा उछलने
चाँद सह्न पर आया होगा

रस्म हुई हाइल गो फिर भी
मुझको वह ख़त लिखता होगा

मुझे पता था शम्स उगेगा
फिर से और उजाला होगा

जो टुकड़ों में आप बँटा हो
क्या तेरा क्या मेरा होगा

जो भी तर्क़ करेगा मुझको
बिल्कुल तेरे जैसा होगा

छोड़ गया था मुझे मगर अब
तू पत्ते सा उड़ता होगा

सोचा नहीं था ज़ीस्त में अपने
उल्फ़त जैसा धोखा होगा

ग़ाफ़िल तो रहता है सबमें
तू बस ख़ुद में रहता होगा

-‘ग़ाफ़िल’

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