चाँद अब रोशनी नहीं देता

चाँद अब रौशनी नहीं देता
अब तो एक आग सी निकलती है ।
देख लो आके उनके आँगन में
बर्फ अब सर्दियों में गलती है ।।
किसको जाना कहाँ ?कहाँ मंजिल?
हर गली रोज ढलती है ।
बैठो गर पाना है पता मंजिल
यहाँ स्वारथ की रेल चलती है।।
तेल में डूब और उसे पीकर
बाती दीये की क्यों मचलती है ।
बात दुनियां की भी निराली है
अपना कह कर उन्हीं को छलती है ।।
क्यों करे बात कोई दरिया की
जहां कागज की नाव चलती है ।
सच की दुनियां तो अब हुई तन्हां
बात अब झूठ की ही चलती है ।।

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