चल दिया सफ़र पर अब मिलना किससे मिरा हो

चल दिया सफ़र पर अब मिलना किससे मिरा हो
क्या मिले कैसा मिले अच्छा हो क़ि बुरा हो

सच से अगर टूटता है दिल-ए-नाज़ुक किसी का
झूठ भी इस कदर बोलना कि सच से भरा हो

मिला है सफ़र ही सफ़र बाद-ए-सफ़र फिर भी
दिखलाओ कुइ जो न ज़िंदा रहने को मरा हो

गहराइयों में जाकर मोती लाते हैं लोग
मेरे नाम का वहाँ भी पत़थर ना धरा हो

चंद सिक्के ज़मा करते करते बिखर गया वो
आदमियत का कुछ सलीका कुछ तो होश ज़रा हो

चमका नहीं जब कुइ मेरे आँगन में या रब
मुझे क्या आसमाँ तिरा तारों से भरा हो

सूरत मिलती हो न चाहे सीरत मिलती हो
दिल से दिल मिल जाए ‘सरु’खोटा हो क़ि ख़रा हो

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