कविता · Reading time: 1 minute

चलो हम थोड़े से इंसान हो जाएँ

तुम सीता और शेखर, हम सलमा और सुलेमान हो जाएँ
तुम थोड़े हिन्दू और हम थोड़े मुसलमान हो जाएँ,
चलो हम थोड़े से इंसान हो जाएँ

हरी सलवार और मस्तक पर वो भगवा बिंदी,
इस धरा के ऊपर सुबह का आसमान हो जाएँ
चलो हम थोड़े से इंसान हो जाएँ

पहन धोती और माथे पे वो प्यारी टोपी
चलो हम सुबह की पहली अजान हो जाएँ.
चलो हम थोड़े से इंसान हो जाएँ

मेरे दिवाली की दीपक की लौ से रोशन
तेरा चाक, चौबारा और मकान हो जाए
चलो हम थोड़े से इंसान हो जाएँ

तेरे ईद की ईदी और इबादत से ,
हमारे जिन्दगी के जंग कुछ आसान हो जाए
चलो हम थोड़े से इंसान हो जाएँ

हमारे ध्यान में अल्लाह की इबादत हो,
तेरे नमाज में अल्लाह भी भगवान हो जाएँ
चलो हम थोड़े से इंसान हो जाएँ

तुम्ही तुम हो तो क्या तुम हो; हमहीं हम हैं तो क्या हम हैं,
क्यूँ न हम तुम सब मिलकर, प्यारा हिंदुस्तान हो जाएँ.
चलो हम थोड़े से इंसान हो जाएँ

निवेदन: मेरी दूसरी रचना “हे मां, तुम्हें नमन है’ पर प्रतिक्रिया दें, अच्छी लगी तो वोट करें. सादर धन्यवाद

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Author
मिथिलेश कुमार शांडिल्य भूतपूर्व वायुसैनिक, RT-157 batch कनिष्ठ कार्यपालक -भेल अनुसन्धान एवं विकाश शिक्षा- एम. ए. , एमबीए ग्राम- आंती जिला-नवादा (बिहार) बर्तमान निवास- बैंगलोर फेसबुक लिंक-facebook.com/mithlesh.kumar.pragyaputra ट्विटर लिंक- twitter.com/mithiiaf
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