चलो न आदि...

आदित्य द ग्रेट “आदि”

भींगी पलकों से ही सही…
चलो न आदि,
एक बार और मुस्कुराते हैं।
जब दर्द कोई समझ ही नहीं पाता अपना…
तो चलो न आदि,
अपने जख़्मों को भी सब से छुपाते हैं।

रूठे हैं सब अपने मुझ से तो रूठे ही सही…
चलो न आदि,
किसी टूटे को ही इस बार अपना बनाते हैं।
भींगी पलकों से ही सही…
चलो न आदि,
एक बार और मुस्कुराते हैं।

बीत गए वो लम्हें तो गुज़र जाए ही सही
चलो न आदि,
कुछ औरों की सुनते हैं, कुछ अपनी भी बताते हैं।
दुखा हुआ दिल रख कर भी
सब का दिल जीत कर आते हैं।
भींगी पलकों से ही सही…
चलो न आदि,
एक बार और मुस्कुराते हैं।

आज फिर से अपनों को अपना बनाते हैं
सब को गले से लगाते हैं।
चलो न आदि,
अपने ही हैं हम, पराये नहीं
सब को यह बताते हैं।
भींगी पलकों से ही सही
चलो न आदि,
एक बार और मुस्कुराते हैं।

– आदित्य कर्ण
दरभंगा, बिहार (मिथिलांचल)

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