चलो कुछ ख्वाब बुनतें हैं

बहुत सुन ली जमाने की।
करो अब जिद कुछ पाने की।
बहुत जिए बिना मकसद।
चलो अब दिल की सुनतें हैं,
चलो कुछ ख्वाब बुनतें हैं।।
हसरतें थी जो जीनें की,
उन्हें जिंदा करें फिर से।
हुनर अपना बताने की,
आज दिल में ठान लेतें हैं।
अभी तक थे बहुत अनजान,
अब खुद को जान लेतें हैं।
चलो अब दिल की सुनतें हैं,
चलो कुछ ख्वाब बुनतें हैं।।
बहुत हारे अभी तक हम,
अब बारी है छाने की।
बहुत खोया तो हुआ क्या,
अब बारी है पाने की।
हममे है जो भी कुछ खास,
उसे पहचान लेतें हैं।
चलो अब दिल की सुनतें हैं,
चलो कुछ ख्वाब बुनते हैं।।
बहुत ली मान किस्मत की,
यकीं अब खुद पर करतें हैं।
लकीरें अपने हाथाें की,
चलो मेहनत से बदलतें हैं।
लड़ख्रड़ाए कदम तो क्या,
चलो फिर उठ जातें हैं।
अभी हिम्मत है चलने की,
चलो सबको बतातें हैं।।
चलो अब दिल की सुनते हैं,
चलो कुछ ख्वाब बुनते हैं।।
…प्रभात इंदौरा

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हैं जो राज वो कह दूं दिल से, इन खामोशियों को कलम ने लब दिए...
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