चली पनघट

चली पनघट
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झनन – झनन झनन – झनन चलत
बजावत है पायलियाँ के घुघरूँन को
खनन – खनन कर करत है मधु ध्वनि
रंग- बिरंगे पहन परिधान रक्तवर्णी
झाँकत है नैनन की कोरन से ऐसे
बाल सूर्य निकला ऊषा की गोद से

पनघट को चलत रख सिर पर गागर
लजाती शरमाती इतराती इठलाती
मृदु मुस्कान बिखेरे है होठन पर ऐसे
कपोलन पर नाच रही दीप की लड़िया
देख बालाओं की यह मतवाली चाल
हिय गैल चलत लड़कन को डोलत है

टुकुर – टुकुर घूरत घूघट के पट से
रिझावत है खिझावत है छोरन को
कटि लागत है जैसे हो कोई नटी
चाल -ढाल देख होश उड़त योगिन
हँसत है हँसी तो लागत है ऐसी
दन्त छवि लगे ज्यों बगुलों की पंक्ति

जब लोटत है मटका धरत सिर
छलकत जावत है टप -टप जल
सिर रखत मटके से ज्यों गिरत जल
धक – धक ध्वनि पैदा करत दिल
चोट बड़ी देवत है यह टप की ध्वनि
मन पे मुकुर टूटत सी चोट करत है

साँवरि सी सूरत पर अंजन की शोभा
देखत लागे ज्यों बाल मेघ झाकत हो
निकल कर श्वेतवर्णी घनों के बीच से
रूप लावण्य उरवशी की प्रतिमा जैसों
देख चाल इन चतुर गोरियन की
अंग -प्रत्यंग छोरन का डोलत जाये

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