*चला गया दरवाजे का अनुभव*

*चला गया दरवाजे का अनुभव*

शहरों से गाँव की ओर चलें तो आज के इस दौर में भी हमें एक बड़ी ही साधारण सी बात देखने को मिलती है। घर के दरवाजे पर बिछी चारपाई और उस चारपाई पर बैठा एक बूढ़ा शख्स जिसके शरीर में इतना बल तो नहीं कि वह घर को किसी बाहरी खतरे से बचा ले। किंतु आज भी वह अपने परिवार पर आने वाली हर बाधा से लड़ने को तैयार घर के द्वार पर एक पहरेदार सा बैठा हुआ है ।उसकी नजरें उम्र के इस पड़ाव में आकर कमजोर हो गई है ।लेकिन फिर भी इंसान को देखते ही परख लेने की जो क्षमता इन नजरों में है वह आधुनिकता के इस दौर में कहीं नहीं । घर के भीतर प्रवेश करने वाले हर इंसान की नियत को भाप लेने वाली आँखें आज भी इस घर की पहरेदार बनी हुई है।
भोर की पहली किरण के साथ अपना और अपने हर काम को खुद करना पीछे आने वाली पीढ़ियों को सीख प्रदान करता था। इस उम्र में भी वह किसी से मदद की उम्मीद नहीं रखता उससे जितना बन पड़ता उतना काम वह स्वयं ही कर लेता। हर शाम घर के सामने से निकलने वाला हर व्यक्ति उसे देख राम-राम करता और उसकी आँखों के सामने गाँव की धूल में खेलते बच्चे खुद को महफूज पाते थे।
शाम के समय उसका घर के दरवाजे पर आकर बैठ जाना बच्चों के संग बातें करना, खेलना और एक छोटी सी हरकत पर अपनी कड़क आवाज में पूछना क्या हुआ सब में एक विश्वास पैदा करता था। और उसकी वह बातें जो वह उन बच्चों के साथ करता था। वो उन बच्चों को कुछ ऐसा दे जाती थी जो कहीं और किसी और रूप में नहीं मिल सकता। आखिर वह उसका बर्षो का अनुभव था जो वह उन बच्चों के साथ बांट लिया करता था।
लेकिन एक शाम वह हर दिन की तरह ही अपने घर के दरवाजे पर बैठा बच्चों से बातें कर रहा था ।मगर आज आज उसकी बातें बड़ी अलग सी थी। जरा जरा सी देर में चुप हो जाता ।
कुछ देर बाद वह एक लंबी सांस के साथ अपनी खाट पर गिर पड़ा एकाएक सबने दौड़ लगा दी। जब पास जाकर देखा तो उस द्वार का वह अमर दीप दिव्य ज्योति में विलीन हो गया था। वह वृद्ध अब इस दुनिया में नहीं रहा। देखते ही देखते वहाँ परिवार वालों की भीड़ लग गई आंसुओं की धार रोके नहीं रुकती। आज उस परिवार ने न केवल अपना एक सदस्य खोया है अपितु ऐसा बहुत कुछ खो दिया जो केवल उस वृद्ध के होने से ही था।उसके कमरे से आने वाली राम-राम की आवाज छोटी-छोटी बातों पर उसकी वह डाँट और अंधेरी डरावनी रातों में उसके होने मात्र से मिलने वाला विश्वास यह सब उस वृद्ध के साथ ही खत्म हो गया । आज की शाम का समय और घर के दरवाजे पर रखा उस वृद्ध का शव पूरे गाँव को एक स्थान पर खडा कर देता है । जिस ओर देखो भीगी हुई आँखे दिखाई दे रही थी। आज केवल एक परिवार नहीं बल्कि पूरा गाँव गम में डूब गया था। आज की शाम वहाँ लोगों की भीड़ लगी रहेगी लेकिन कल….? कल सुबह उस व्रद्ध को उस दरवाजे से ले जा लिया जाएगा और साथ चला जाएगा उस दरवाजे का अनुभव। वह अनुभव जो आज तक उस परिवार की हिफाजत करता रहा, एक विश्वास देता रहा, उनका साथ निभाता रहा ।
कल के आने वाली हर सुबह एक अलग सुबह होगी जहाँ सब कुछ तो होगा लेकिन घर के दरवाजे पर डली वह चारपाई खाली ही रहेगी। कल से घर में न तो राम नाम की आवाज आएगी और न सुनाई पड़ेगी वह डांट जो घर को घर बनाए रहती थी। उस वृद्ध के न होने से घर का वह आंगन कल से वीराना हो जाएगा। और वह द्वार जो अब तक सबसे अनुभवी द्वार कहलाता था एक बार फिर अनुभवहीन हो जाएगा । क्योंकि उसे अनुभवी बनाने वाला बूढ़ा व्यक्ति, वह अनुभव अब इस दुनिया में नहीं रहा और उस जैसा अनुभव कमाने में न जाने कितने बरस लग जाएेंगे।

भवानी प्रताप सिंह ठाकुर
भोपाल (मध्यप्रदेश)
संपर्क – 8989100111
ईमेल- thakurbhawani66@gmail.com

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