** चलना थोड़ी दूर था **

चलना थोड़ी दूर था
उसमे ही
क़दम लड़खड़ा गये
फिर क्या जिंदगीभर
साथ निभाओगे तुम
याद करके वो वादे
और कसमे हमनशीं
कभी तुम पे तो कभी
खुद पे आती हँसी
इब्तिदा-ए-इश्क में खायी थी
कसमे संग जीने मरने की
आज क़दम दो चलना
साथ में गवारा नहीं
तुम्हारे शिद्दत-ए-इश्क को
समझूं क्या
सिर्फ जिस्म तुष्टि का बहाना कोई
चलना थोड़ी दूर था
वरना संग चलना तुम्हारे क्या
दौड़े आते तुम्हारी इक सदा पे हम
यूँ राहे इश्क में संग जीते और मरते हम
यूँ तुम्हारी तरहा रुकने का ना करते बहाना
चलना थोड़ी दूर था उसमें ही क़दम लड़खड़ा गये
चलना थोड़ी दूर था
चलना थोड़ी दूर था ।।

?मधुप बैरागी

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