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चलते चले..

वे चलते चले…… वे-सहारा होके
जमे जमाये काम और रोजगार खोके,
कन्धों पे गठरी, झोले सन्दूक लेके।
छोटे छोटे दुधमुहोँ को गोद मे ढ़ोके ।

भूख-प्यास, धूप-जलन अपमान सहकर
तपती सडकों पर सैकड़ो हजारों मील चलकर।
बुजुर्ग माँ-बाप की फिर से छत्र छाया पाने
चलो, लौटे तो सही…..इसी बहाने।।

सूक्ष्म वाइरस ने कितने भरम तोड़ दिये
अपना था जो शहर उसने वे-सहारा छोड़ दिये।
कितनी मजबूरियाँ लादे लाखो लोग चले
इतने वेबस तंग-हाल एक साथ मिले।।

एक-दूसरे के साथ, साथ-साथ चल दिये
एक से भले दो,चार, आठ, सोलह, बत्तीस हो लिये।
कहते सुनते एक-दूसरे की पीर चलते रहे
मूक सिसकी लिये पाँव के छालों का दर्द सहते रहे।।

आधुनिकता के नाम पर बाज़ार तूने ये क्या कर दिया
सपने जगा के घोर महत्वाकांक्षाओं का बीज वो दिया।
छुड़वा दिये घर-वार शहरी रंग में ढल जाने को
जलते चरागों के बीच पागल पतंगा बन जाने को।।

स्नेह-प्यार अपनापन हँसी ठिठोली भूले
छोड़े शुद्ध घी दूध आँगन घर और चूल्हे।
कोयल की टेर और आमों पे पड़े झूले
आल्हा-ऊदल के किस्से कुंआ पोखर के कूले।।

देखो, समझो, जागो समय की पुकार सुनो
अपनी माटी से प्यार करो, यहीं सपने बनो।
नियन्त्रित हो जनसँख्या, बच्चे पढ़ें लिखें
खेत खलिहान से समृद्धि हो, गाँव खुशहाल दिखें।।

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Yashwant Singh Rathore
Yashwant Singh Rathore
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