चपले

तोटक छंद

११२-११२-११२-११२

चमके दमके नभ में चपले।
दिखला कर रूप छटा मचले।
यह बादल में छिपती रहती।
बतियाँ उससे कितना करती।

डरता रहता मन चंचल है।
नभ से करती रहती छल है।
कितना गरजे, तड़के,कड़के।
मन तो लगता नभ से लड़के।

रिपु से मिलते मुख लाल हुई।
करना बध है विकराल हुई।
मुख कोमल क्रोधित हो जलती ।
तन पावक -सी जलती-बुझती।

अवनी जब बादल से मिलती।
तुम सौतन-सी जलती रहतीं।
गुण कोमलता तब त्याग दिया।
कटु जीवन को उपहार दिया।

उर निर्मम निष्ठुर पत्थर है।
पर ऊपर से तन सुंदर है।
तन सुंदर केवल मोल नहीं।
रखना गुण सुंदर बोल सही।

लक्ष्मी सिंह
नई दिल्ली

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