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चक्रव्यूह और मैं !

Neeraj Chauhan

Neeraj Chauhan

कविता

November 14, 2016

अब भी कुछ बिगड़ा नहीं हैं,
इतना समय गुज़रा नहीं हैं
पता नहीं की हार होगी,
या फिर होगी विजय;

अब समक्ष दिखता यही बस;
चक्रव्यूह और मैं !

मारा जाऊंगा अभिमन्युवत्,
या कृष्ण के सुदर्शन सा चीर दूंगा
इस धधकती ज्वाला में ,
मैं किन कर्मों का नीर दूंगा;
सोचता हूँ दिन रात, अब बस यह

हैं समक्ष दिखता यही अब,
चक्रव्यूह और मैं !

कोसूंगा असमय हाथ छोड़ने वाले को,
या समझदार हो जाऊंगा
इस मीठी-छलिया दुनियां से,
कहो कैसे पार मैं पाउँगा?
ये रात हुई ‘पक्षपाती’
जाने कब होगी सुबह

अब समक्ष दिखता यही बस;
चक्रव्यूह और मैं !

– © नीरज चौहान

Author
Neeraj Chauhan
कॉर्पोरेट और हिंदी की जगज़ाहिर लड़ाई में एक छुपा हुआ लेखक हूँ। माँ हिंदी के प्रति मेरी गहरी निष्ठा हैं। जिसे आजीवन मैं निभाना चाहता हूँ।
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