चक्की चलाती माँ

चक्की के घूमते पाट
धुंधली सी यादों में आते हैं
माँ के मजबूत हाथ
पत्थर के पाटों को चलाते हैं

नवरात्रि की अष्टमी पर
देवी माँ हाथ की चक्की से
पिसे आटे का ही भोग लगाती है
माँ की आस्था मुझे समझाती है

घर भारी पत्थर का पाट है
जिसे माँ बरसों से चला रही है
इस चक्की को माँ नही पीस रही
उल्टे ये चक्की माँ को पीस रही है

ट्विंकल तोमर सिंह
लखनऊ

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