" चंदा मामा "

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चंदा मामा लगते हैं जैसे दूध का कटोरा ,
कभी दिखते आधा पूरा ,
कभी कर देते आसमान को सुना ।

तारों के बीच लगते हैं जैसे कोई चमकता गोला ,
हर पंद्रह दिन में खेलते हैं आसमान से ही हम सब के साथ छुपन – छुपाई का खेला ।

अपनी चांदनी से कभी बिखेरे उजाला ,
कभी कर बिल्कुल अंधेरा ,
चंदा मामा का ये खेला है बड़ा अलबेला ।

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🙏 धन्यवाद 🙏

✍️ ज्योति ✍️
नई दिल्ली

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