Nov 23, 2018 · कविता

चंचल मन

चंचल मन उड़ता पुरजोर पवन में
अरमानो के पंख लिए नील गगन में

कभी विश्वासों की डोर बाँध जाता
आशाओं की डगर को जाता
व्याकुल मन दर्पण बन जाता
दुविधा सारी पल में छू कर जाता
कभी उलझता कभी सुलझता
क्षण भर में कितना इठलाता
पल भर में जाने कितनी सैर को जाता
चंचल मन उड़ता पुरजोर पवन में
अरमानो के पंख लिए नील गगन में

निर्मोही मन की परते अनेक
हर इक लिपटी संशय में
राही अडिग है फिर भी पथ पे
उत्साह उमंगें लिए हृदय में
आशाओं के सागर में
बढता जा इस भवसागर में
बढ़ते ही पहचान है तेरी
रूकने की कोई राह नहीं
चंचल मन उड़ता पुरजोर पवन में
अरमानो के पंख लिए नील गगन में

कभी विह्ग बन उड जाता गगन में
पतंग सम लहराता कभी अपने ढंग में
कभी लहरों संग हिलोरे लेता
मन की दृढ़ता से ही जीत हमारी
मन के विचलित होने पर हार
नैया इसी पतवार से पार लगानी
सुन ओ जरा खेवनहार

चंचल मन उड़ता पुरजोर पवन में
अरमानो के पंख लिए नील गगन में

नेहा
खैरथल (अलवर )
राजस्थान

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