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घाव

विनोद कुमार दवे

विनोद कुमार दवे

शेर

October 2, 2016

नाम लिखते है मिटाते है,
अपने ही नाम से अपना दिल बहलाते है,
उसका नाम समाया है मेरे नाम में,
इसी बहाने खुद को उसकी याद दिलाते है।
*** ***
जो घाव लगता है ‘दवे’ दिल पर, पूरा लगता है,
अब तो ख़ुद का नाम भी अधूरा लगता है

*** ***
हमें देख कर वो नज़र झुका कर गुजर जाती है,
ख़ुदा जाने मुझसे नफरत है या मुझसे शर्माती है।

Author
विनोद कुमार दवे
परिचय - जन्म: १४ नवम्बर १९९० शिक्षा= स्नातकोत्तर (भौतिक विज्ञान एवम् हिंदी), नेट, बी.एड. साहित्य जगत में नव प्रवेश। पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।अंतर्जाल पर विभिन्न वेब पत्रिकाओं पर निरन्तर सक्रिय। 4 साझा संकलन प्रकाशित एवं 17 साझा संकलन प्रकाशन... Read more
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