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घर

Ranjana Mathur

Ranjana Mathur

कविता

October 8, 2017

केवल चार दीवारों के भीतर बनाए
गए कमरों का नाम नहीं है घर।
कोने कोने में रहती है जहाँ जिन्दगी
पग पग पर मिलती है जहाँ खुशी।
हर पल खिलखिलाती है जहाँ हंसी
चारों तरफ बिखरी है जहाँ मुस्कान।
पल पल बरसता जहाँ अपनापन
वही घर होता है नहीं होता है मकान।
यही है घर की असली परिभाषा
यही है घर की असली पहचान ।
ईंट पत्थर की चारदीवारी में
जब पड़ जाती है अपने पन की जान।
तब कहीं जा कर एक प्यारे से घर में
बदल पाता है कोई मकान।

—रंजना माथुर दिनांक 08/10/2017
मेरी स्व रचित व मौलिक रचना
©

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Author
Ranjana Mathur
भारत संचार निगम लिमिटेड से रिटायर्ड ओ एस। वर्तमान में अजमेर में निवास। प्रारंभ से ही सर्व प्रिय शौक - लेखन कार्य। पूर्व में "नई दुनिया" एवं "राजस्थान पत्रिका "समाचार-पत्रों व " सरिता" में रचनाएँ प्रकाशित। जयपुर के पाक्षिक पत्र... Read more
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