घर बिना विशवास के चलता नहीं

घर बिना विशवास के चलता नहीं
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घर बिना विशवास के चलता नहीं
आजमाना अपनों को अच्छा नहीं

ज़िंदगी की तल्खियों के खौफ से
मुस्कुराता हूँ कभी डरता नहीं

छाँव राहत की ज़रा अब चाहिए
दिल ज़रा भी आंच अब सहता नहीं

नींद से दूरी बना ली रात ने
ख़्वाब उसको कोई अब भाता नहीं

ज़िंदगी क्या ज़िंदगी हो बेमजा
शौक जीने का अगर रहता नहीं

ढूंढ कर परछाइयाँ भी क्या करूँ
जो खुदा के घर गया मिलता नहीं

मौत ने आवाज दी मुझको मगर
ज़िंदगी ने हाथ पर छोड़ा नहीं
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निर्मला कपिला
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लेखन विधायें- कहानी, कविता, गज़ल, नज़्म हाईकु दोहा, लघुकथा आदि | प्रकाशन- कहानी संग्रह [वीरबहुटी],... View full profile
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