घबराते क्यूं हो...???

मैं ही तो हुं जो सब करा रहा हूं
घबराते क्यूं हो ?
प्रियजनों को पास बुला रहा हूं
मुझ से होकर ही आए थे
मुझ से होकर ही लौटोगे
घबराते क्यूं हो?
भागते कदमों में मैं हूं
ठहरे हुए जीवन में भी मैं हुं
पीठों पे पड़ती लाठी में मैं हूं
सांझ के दिया बाती में मैं हूं
घबराते क्यूं हो ?
मैं ही मैं हूं… क़तील भी मैं खंजर भी मैं
दल्ला भी मैं नल्ला भी मैं
मुंसिफ भी मैं मक़तूल भी मैं
सखी भी मैं दुशासन भी मैं
मैं ही मैं हूं डरते क्यूं हो…😏
सेठों साहूकारों में मैं हूं
मिले हुए अनुदानों में मैं हूं
कहे गए आख्यानों में मैं हूं
भूख और निवाले में मैं हूं
मैं ही चेतन, मैं ही अचेतन
मैं ही विध्वंस मैं ही तुम्हारा प्रारब्ध
मैं ही मैं हूं घबराते क्यूं हो ?
आओ मिल जाओ मुझ से
मैं ही माधव मैं ही केसव
मैं ही नर मैं ही नारायण
घबराते क्यूं हो…???
~ सिद्धार्थ

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मुझे लिखना और पढ़ना बेहद पसंद है ; तो क्यूँ न कुछ अलग किया जाय......
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