घनाक्षरी

3-07-2017
तीन रूप घनाक्षरी
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1

उमड़ उमड़ कर, गरज गरज कर,बादल ये काले काले , गा रहे विरह गीत
कड़क कड़क कर, दामिनी भी करे शोर, लगता बिछड़ गया, इसका भी यहाँ मीत
इनकी अगन देख ,हो दुखी धरा गगन, लाये खुशियों से भरी , सावन की तभी रीत
रिमझिम रिमझिम, टप टप टप टप, सुर लय ताल सब, बूंदों में भरा संगीत

2

मोह माया से अलग, प्रभु का तू नाम जप, भूल सब द्वेष भाव, मन में बसा ले राम
रहे एक सी न काया, आनी जानी है ये माया,रिश्ते भी हैं साँस तक, सत्य बस राम नाम
लोग करें तुझे याद,तेरे जाने के भी बाद, नाम हो अमर तेरा, कर यहाँ ऐसे काम
कल पर मत छोड़, आज से ही नाता जोड़, नहीं जानते आ जाये ,कब ज़िन्दगी की शाम

3

बात मनवाने को ही , रूठते हैं बार बार ,बहाते भी रहते हैं, अँसुवन भरी धार
होती है हमारी हार, चाहे कोई करे वार, आंसुओं से बड़ा कोई, होता नहीं हथियार
दिल पे भी तो हमारे, इनका है पूरा राज , घर पे भी चलती है, इनकी ही सरकार
छोटी मोटी नोंक झोंक ,लगती मगर प्यारी , इनसे ही जीवन में , बढ़ता भी देखो प्यार

जलहरण घनाक्षरी

कोकिला मधुर बोले, चंचल पवन चले ,अमवा पे पड़े झूले ,आया है सखि सावन
काला काला नभ हुआ, मन मंत्र मुग्ध हुआ,चल रहे सँग सँग , घिरे घनघोर घन
खिल रहे पात पात ,झूम रही डाल डाल ,देख ऐसी हरियाली ,झूमे अपना भी मन
रिमझिम रिमझिम , होने लगी बरसात, धरा की बुझाने प्यास , खुशी से भरा जीवन
डॉ अर्चना गुप्ता

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