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घनाक्षरी

“बेटी”
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पिता की है शान बेटी,
माँ का स्वाभिमान बेटी,
घर की है आन बेटी,
गर्भ न गिराइए।

मनोहारी कामना सी,
उपकारी भावना सी,
सुखकारी धारणा सी,
कोख न मिटाइए।

दुर्गा सी विकराल है,
ये असुरों का काल हैै,
रणचंडी कमाल है,
मान न घटाइए।

बेटी तो उपहार है,
जग का उजियार है,
बेटी से परिवार है,
बेटी को बचाइए।

डॉ. रजनी अग्रवाल ‘वाग्देवी रत्ना’

हरिहरण घनाक्षरी
(8,8,8,8 प्रत्येक चरण की हर यति पर लघु लघु समतुकांत समवर्ण)
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“चुनौती स्वीकार कर”
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मत शर्मसार कर,
सुख-दुख टार कर,
धैर्य आज धार कर,
बैठ नहीं हार कर।

दंभ तार-तार कर,
जीवन सँवार कर,
जगत उद्धार कर,
कुछ चमत्कार कर।

नेह से निहार कर,
एकता प्रसार कर,
पर उपकार कर,
धर्म का संचार कर।

जननी को प्यार कर,
शूरवीर वार कर,
चुनौती स्वीकार कर,
जीवन निस्सार कर।

डॉ. रजनी अग्रवाल ‘वाग्देवी रत्ना’
वाराणसी (उ. प्र.)
संपादिका-साहित्य धरोहर

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