घनाक्षरी- छाले पड़े पाँव में

घनाक्षरी- छाले पड़े पाँव में
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रोटी की तलाश हेतु जाम में फँसे हैं आज,
कभी दिन कटते थे पीपल की छाँव में।

गंदगी शहर की ये झेलते हैं रात दिन,
ताज़ी खूब ताज़ी हवा मिलती थी गाँव में।

किन्तु सुविधाओं का है बहुत अकाल वहाँ,
यहाँ वहाँ भागने से छाले पड़े पाँव में।

एक पाँव गाँव एक शहर में रहता है,
आधे आधे बट गए हम दोंनो ठाँव में।

घनाक्षरी- आकाश महेशपुरी
दिनांक- 15/06/2019

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