गज़ल

“मै तेरी राह तकती हूँ , तुम्हें ये मन बुलाता है,
चले आओ तुम्हें सूना मेरा आँगन बुलाता है,

बरसती हैं मेरी आँखें, ये बारिश अब नहीं रुकती
तुम्हें भीगे हुये अश्कों का ये दामन बुलाता है,

तुम्हें संग बाग में बैठे हुए पल याद आते हैं?
ये झूले पूछते हैं अब, तुम्हें सावन बुलाता है,

गुलिस्तां जब से उजड़ा है, वहारें भी नहीं लौटीं
फ़िजा आवाज़ देती है, तुम्हें उपवन बुलाता है,

दर-ओ-दीवार औ राहें ,सभी तन्हा सी हैं तुम बिन,
सँवरते थे जहाँ पहले, वही दरपन बुलाता है,

चले आओ सनम तन्हाइयाँ जीने नहीं देतीं
तुम्हें हर पल मेरे दिल का ये सूनापन बुलाता है “

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