*गज़ल*

जान जाने के हैं’ आसार खुदा जाने क्यों
आप से हो गया’ है प्यार खुदा जाने क्यों

बात जिनमें हो तुम्हारी ही तुम्हारी केवल
अच्छे लगते हैं वो अशआर खुदा जाने क्यों

दूरियाँ हमने मिटा दीं हैं सभी जब उनसे
फिर खड़ी बीच ये दीवार खुदा जाने क्यों

आज जितना भी’ सितम चाहो’ ख़ुशी से कर लो
दिल, जिगर, जान हैं’ तैयार खुदा जाने क्यों

फैसला आज मिलेगा सुना है अर्जी पर
बदला – बदला सा है दरबार खुदा जाने क्यों

हर समय जब भी बढ़ाये हैं कदम हमने तब
प्यार की राह मिली हार खुदा जाने क्यों

इश्क में डूब के देखा कि ‘प्रणय’ है इसमें
दर्द ही दर्द की भरमार खुदा जाने क्यों
लव कुमार ‘प्रणय’
(आर/ खुदा जाने क्यों
2122 1122 1122 22)

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लेखन में रूचि अनेक सह संकलनों में रचनायें संकलित प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित एवं...
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