गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

गज़ल

तेरे लबो की ही दुआ हूँ मै
गुल बनके आँचल में खिला हूँ मै

क्यो कररहे शिक्वे शिकायत तुम
तेरी हि नफरत का सिला हूँ मै

इक रोज तो बुझ जाएंगे हम भी
जलता हुआ बस इक दिया हूँ मै

तुमने लिखी जो आयतें दिल पर
उन आयतों से अब खफा हूँ मै

आदी नही था गम में जीने का
इन खुशियों से ही जला हूँ मै

महफूज था में तेरे साये में
अब दर्द – ऐ- दिल की दवा हूँ मै

फिर रात बीती बे करारी में
इस इश्क -ऐ- गम की वफ़ा हूँ मै
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
20/9/2017

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