गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

गज़ल

मेरे दिल पे ख्वाबों का पहरा रहा है
मुहब्बत को दिल ये तडपता रहा है

न तारे से पूछो कभी दर्द उसका
जो अम्बर से नीचे ही गिरता रहा है

मेरा आइना दिल निशाने पे उसके
वो पत्थर लिये रोज फिरता रहा है

किसी मां से पूछो शहाद्त की कहानी
दिया जिसके घर का भी बुझता रहा है

वफ़ा का सिला जब जफ़ा में मिला हो
जिगर में यही दर्द उठता रहा है

दया भावना से है महरूम इन्सां
अब इन्सान इन्सान को खा रहा है

सदा पास रह भी रहा फासला सा
वफा को जफा हश्र मिलता रहा है

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