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शब ओ रोज़ ओ माह ओ साल ‘अहमद’

M Furkan Ahmad

M Furkan Ahmad

गज़ल/गीतिका

November 28, 2017

मोहब्बत की है हर एक गम सहना है
अपनी रूदाद किसी से भी न कहना है
“““““““““““““““““““““
बस एक ही खुवाहिश है मेरी ऐ बेगम
मुझे तेरी ही आगोस में जीना मरना है
“““““““““““““““““““““
नन्ही बच्ची ने देखा है जब से चिड़या
जिद किये बैठी है पापा मुझे उड़ना है
“““““““““““““““““““““
मत खीच इस दलालो की सियासत में
हमे तो उमर भर पाक साफ रहना है
“““““““““““““““““““““`
हमेशा तुम भी रहा करो खुश मिजाज
इंशा हो कोई सब्जी नही जिसे सड़ना है
““““““““““““““““““““““
जान कुर्बान हो मुल्क की सरपरस्ती में
इस्लाम कह रहा है हमे भी मर मिटना है
““““““““““““““““““““““`
शब ओ रोज़ ओ माह ओ साल ‘अहमद’
बुढ़ापे में माँ की दिदो की रौशनी बनना है

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Author
M Furkan Ahmad
From: लखनऊ
मोहम्मद फुरकान अहमद सिद्दीक़ी लखनऊ शहर से है! हम फ़ुरकान अहमद की लिखी रचनाएं अपको दे रहे हैं आप आपनी राय हमे बताये!
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