गज़ल :-- व्यंग ......मुँह मथानी हो गय़ा !!

ग़ज़ल :– व्यंग….. मुँह मथानी हो गय़ा !!

बहर :–
2122—2122—2122—212 =26

चंद पैसों की तपिश में वो गुमानी हो गय़ा !
छाछ सी खट्टी जुबां अरु मुँह मथानी हो गय़ा !!
!
उम्र बढ़ते बाप-दादों का पता अब तक नहीं !
खैरियत क्या पूछ ली वो खानदानी हो गया !!
!
इक हुआ प्रस्ताव पारित चार झन के जोर से !
चौक उसके नाम का वो राजधानी हो गय़ा !!
!
रौब से अब रंग बदला चाल कमसिन हो गई !
ख्वाब में उड़ता रहा वो आसमानी हो गय़ा !!
!
क्या कहें तारीफ़ में वो हैं लताड़े जा चुके !
आसरा हम कर लिये वो स्वाभिमानी हो गय़ा !!

कवि – अनुज तिवारी “इन्दवार”

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like Comment 0
Views 151

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share