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ग्रीष्म गीत

*ग्रीष्म गीत*
रिस रही है फिर गगन से,
यूँ विरह की आग।
तप्त रवि उर -वेदिका पर,
कर रहा हो याग।

क्षण प्रतिक्षण बढ़ रही है,
प्रेम की बस प्यास।
अश्रु धारा व्यग्र किंचित्,
हो रही नित ह्रास।
बुध्दि विवरों से निकलकर,
लोटते उर नाग।
रिस रही है फिर गगन से,
यूँ विरह की आग।

फिर शिरीषों के हुए हैं ,
रक्त रञ्जित हाथ।
सांत्वना की छाँव शीतल,
छोड़ती अब साथ।
दग्धता में भस्म होता,
भावना का बाग।
रिस रही है फिर गगन से,
यूँ विरह की आग।

दोपहर नित आ जलाती,
शांत है कुछ रात।
वायु अंबर वीथिका से ,
कर रही आघात।
कुछ उषा कुछ साँझ आकर,
गायें’ शीतल राग।
रिस रही है फिर गगन से,
यूँ विरह की आग।

अंकित शर्मा ‘इषुप्रिय’
रामपुर कलाँ, सबलगढ(म.प्र.)

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