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गैरो मे कहॉ दम है ..अपने ही चोट दे जाते हैं

NIRA Rani

NIRA Rani

कविता

November 12, 2016

क्या हुआ कुछ वक्त के थपेड़ो ने कमजोर कर दिया
टूटा तो वो पहले ही था हालातों ने ढेर कर दिया

गुमा होता है कि जिंदगी मुस्कराएगी
एक बार फिर तरो ताजा हो जाएगी
ताउम्र शायद ये हसरत रह जाएगी ……
कि जिंदगी फिर से मुस्कुराएगी ..

क्यूं कुछ जख्म नासूर बन जाते है
क्यूं कुछ रिश्ते बनते बनते बिगड़ जाते है
इसॉ की शक्ल मे क्यूं भेड़ बन जाते है
खून के रिश्ते ही रिश्तो का खून कर जाते है
गैरो मे कहॉ दम है अपने ही चोट दे जाते है

Author
NIRA Rani
साधारण सी ग्रहणी हूं ..इलाहाबाद युनिवर्सिटी से अंग्रेजी मे स्नातक हूं .बस भावनाओ मे भीगे लभ्जो को अल्फाज देने की कोशिश करती हूं ...साहित्यिक परिचय बस इतना की हिन्दी पसंद है..हिन्दी कविता एवं लेख लिखने का प्रयास करती हूं..
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