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*गृहस्थ और साधुवाद*

Dr. Mahender Singh

Dr. Mahender Singh

कविता

August 18, 2017

शांति की चाह में पहुँच गया जंगल में,
मंगल की आश में गए पहुँच दंगल में,

मार्ग-दर्शक थे जो बचपन के
वीणा कस वाणी उनकी सुनाते थे,
परमपूज्य खुद को नहीं ..उनको बताते थे,

पढ़ लिया बचपन गौतम सा,
न जाने क्यों ? उनके मार्ग-दर्शक
जंगल का हर राज छुपाये थे,

पशु नहीं जो पाश पड़े,
सोच लिया क्यों ?
न करूँ सुलह ..
पहले इस तन मन से ,

फिर सोचा पहले समर्थ बनें,
रोटी कपड़ा और मकान संग में
स्वावलंबी होने का आधार धरे,
ये सिंहासन श्रेष्ठ सजा,
सब शिकायतें दूर हुई जो फैली थी
उदास मन से…

अब गृहस्थ में ही सबसे बड़ा मंगल है,
जब रहा नहीं दंगल ….इस मन में,

डॉ महेंद्र सिंह खालेटिया,
गृहस्थ आश्रम सबसे श्रेष्ठ..,

Author
Dr. Mahender Singh
(आयुर्वेदाचार्य) शौक कविता, व्यंग्य, शेर, हास्य, आलोचक लेख लिखना,अध्यात्म की ओर !
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