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गुम्मा है साहब !

“गुम्मा है साहब ! “
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– इन्हें पहचानती हो ? -वकील ने जज साहब के सामने उससे पूछा।
– नहीं साहब !
– झूठ बोलती है साहब ये ! मेरे मुवक्किल का सिर फोड़ने की बाद अब ये उसे पहचानने से भी इनकार कर रही है।
– इसे तो जानती होगी ? -वकील ने फिर उस ईंट के टुकड़े को दिखाते हुए पूछा।
– “गुम्मा” है साहब ! इसे हम गरीब लोग जानते भी हैं और पहचानते भी । यही तो है हमारा एकमात्र सहारा ! जो “इन” जैसे कुत्तों का सिर फोड़ने के काम आता है, जब ये झपटते हैं हमारी इज्जत पे !
मामला शीशे की तरह साफ़ हो चुका था।
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हरीश चन्द्र लोहुमी, लखनऊ (उ॰प्र॰)
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हरीश लोहुमी
हरीश लोहुमी
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कविता क्या होती है, नहीं जानता हूँ । कुछ लिखने की चेष्टा करता हूँ तो...
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